बुंदेली साहित्य के पुरोधा डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव की 106वीं जयंती पर गूंजा काव्य पाठ

बुंदेली साहित्य के पुरोधा डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव की 106वीं जयंती पर गूंजा काव्य पाठ,
✍️राजेश कुमार तिवारी कटनी न्यूज 24
कटनी। बुंदेली भाषा एवं साहित्य के उद्भट विद्वान, शिक्षाविद और साहित्यकार डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव की 106वीं जयंती पर स्थानीय शिकागो पब्लिक स्कूल स्थित अमर शहीद हेमू कालानी स्मृति वाचनालय में साहित्यिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में डॉ. श्रीवास्तव के व्यक्तित्व, कृतित्व और बुंदेली तथा हिंदी साहित्य में उनके योगदान को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भोपाल से वल्चर संरक्षण के क्षेत्र में राष्ट्रव्यापी अभियान चला रहे दिलशेर खान तथा विशिष्ट अतिथि जन अभियान परिषद के समन्वयक बालमुकुंद मिश्रा रहे। अतिथियों एवं उपस्थित साहित्यप्रेमियों ने डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव के छायाचित्र पर पुष्पमाला अर्पित कर उन्हें नमन किया।
वक्ताओं ने कहा कि कटनी जिले के पिपरहटा जैसे छोटे से गांव में जन्म लेकर डॉ. श्रीवास्तव ने अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान बनाई। कटनी में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने जबलपुर के हितकारिणी महाविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर, रीडर, प्रोफेसर और प्राचार्य जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया।
डॉ. श्रीवास्तव ने अपने शोधपरक लेखन के माध्यम से बुंदेली और हिंदी साहित्य को समृद्ध करने के साथ ही अनेक महत्वपूर्ण शैक्षणिक कृतियों की रचना की। उनके साहित्यिक योगदान ने बुंदेली भाषा को व्यापक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जबलपुर की विभिन्न साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं के सहयोग से उनके जन्मदिवस 1 सितंबर को ‘बुंदेली दिवस’ के रूप में मनाया जाता है, जो कटनी जिले के लिए भी गौरव का विषय है।
कार्यक्रम के दौरान डॉ. श्रीवास्तव के चर्चित कविता संग्रह ‘भौंरहा पीपर’ में संकलित कविताओं का काव्य पाठ किया गया। उनकी रचनाओं के माध्यम से साहित्यप्रेमियों ने डॉ. श्रीवास्तव की साहित्यिक संवेदना और बुंदेली संस्कृति के प्रति उनके गहरे जुड़ाव को स्मरण किया।
इस अवसर पर श्रीमती भारती नागवानी, मुस्कान मूजर, रानी खरे, मोहन नागवानी, राजेंद्र सिंह ठाकुर, एडवोकेट नानक देवानी, पी.डी. बैरागी सहित साहित्यप्रेमी एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।




